आशिकाना कानपुर…

Spread the love
तेरे हुस्न  के मोतीझील में फंसकर
 तेरे इश्क में परेड किये जाता है
दिल धड़कता था कभी घंटाघर सा
अब यादों का भैरवघाट बना जाता है
तुम लगती हो जैसे गिलौरी चौरसिया की 
यहाँ ठग्गू के लड्डू सा मुंह हुआ जाता है
तेरी सूरत के इस्काँन मंदिर को देखकर
मेरा मन भी ब्लूवर्ड सा मचल जाता है
चहकती हो तुम मालरोड की शाम सी
मेरा प्यार यहाँ कबाड़ी मार्कट बना जाता हैं
तेरी पतली कमर है जैसे गलियाँ चमनगंज की
उस पर मेरा दिल अफीम कोठी के जाम सा रुक जाता है
बदन है खूबसूरत तुम्हारा फूलबाग सा  
ये आशिक नौबस्ता की धूल में नहाये जाता है।  
नहीं खुलती सोमवार को जब गुमटी तेरी
ग़ुस्से से मेरा मन बर्रा हुआ जाता है।
हर शाम जब होता है दर्शन तेरा 
मन मेरा 80 फ़िट रोड सा हो जाता है।
और जब देख लेता है तेरा बाप कर्नल गंज मुझे 
लाठी से उसकी मेरा कल्याण पूर हो जाता है!
अब कैसे कहूँ मैं तुझसे,
तुझपे मुझे आशिकाना कानपुर नज़र आता है !
आशिकाना कानपुर नज़र आता है !
आशिकाना कानपुर नज़र आता है !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *